स्वामी विवेकानंद पुण्यतिथि विशेष
Post By : CN Rashtriya Webdesk   |  Posted On: 4 weeks ago  |  232

स्वामी विवेकानंद पुण्यतिथि विशेष

 पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में 12 जनवरी सन् 1863 में एक महान विभूति का जन्म हुआ था जिन्होंने दुनिया को अपने ज्ञान, तप व वैराग्य से एक नयी सोचने की दिशा दी। जिनको स्वामी विवेकानंद जी के नाम से विश्व में जाना जाता है। उनके बचपन का नाम नरेंद्र था नरेंद्र दत्त। स्वामी जी ने अपने जीवन की अंतिम सांस 4 जुलाई 1902 को कोलकाता के ही हावड़ा स्थित बेलूर मठ में ली जो वर्तमान आज पर्यटकों व उनके आदर्शों को मानने वालों का आकर्षण केंद्र बना हुआ। आर्इये जानतें है उनके बारें में विस्तार से  ।


जन्म, बाल्यकाल व शिक्षा

स्वामी विवेकानंद जी के बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। बाल्यकाल में ही विवेकानंद के व्यवहार में दो बातें स्पष्ट रूप से सामने दिखाई देने लगीं थी पहला वे श्रद्धालु व दयालु तो थे ही, साहसी भी थे। स्वामी विवेकानंद का संपूर्ण कुटुंब धार्मिक होने की वजह से बाल्यावस्था में ही उन पर धर्म विषयक योग्य धार्मिक संस्कार होते गए। साल 1870 में उन्हें उनका नामांकन ईश्वरचंद्र विद्यासागर की पाठशाला में कराया गया। पाठशाला में रहते हुए अध्ययन करने के साथ-साथ स्वामी विवेकानंद जी ने बलोपासना भी की। उनमें स्वभाषा का अभिमान भी था, यह दर्शाने वाली एक घटना है। अंग्रेजी शिक्षण के समय उन्होंने कहा था कि गोरों की अर्थात यवनों की इस भाषा में मैं कदापि नहीं पढूंगा। ऐसा कहकर लगभग 7-8 महीने उन्होंने वह भाषा सीखना ही अस्वीकार कर दिया। अंत में विवश होकर उन्होंने अंग्रेजी सीखीं। विवेकानंद ने मैट्रिक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर कुल की तथा पाठशाला की प्रतिष्ठा बढ़ाई। आगे कोलकाता के प्रेसिडेंसी कालेज से उन्होंने `तत्त्वज्ञान’ विषय में एमए किया।


गुरु भेंट तथा संन्यास दीक्षा

स्वामी जी के घर में ही पले-बढ़े उनके एक संबंधी डाॅ. रामचंद्र दत्त रामकृष्ण परमहंस के भक्त थे। धर्म के प्रति लगाव से प्रेरित हो नरेंद्र के मन में बचपन से ही तीव्र वैराग्य उत्पन्न हुआ। यह देख डाॅ. दत्त एक बार उनसे बोले-भाई, धर्मलाभ ही यदि तुम्हारे जीवन का उद्देश्य हो तो तुम ब्रह्म समाज इत्यादि के झंझट में मत पड़ो। तुम दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण जी के पास जाओ। एक दिन उनके पड़ोसी सुरेंद्रनाथ के घर पर ही रामकृष्ण परमहंस के उन्हें दर्शन हुए। प्रारंभ के कुछ दिन रामकृष्ण नरेंद्रनाथ को अपने से क्षणभर भी दूर नहीं रखना चाहते थे। उन्हें पास बैठाकर अनेक उपदेश दिया करते। इन दोनों की भेंट होने पर आपस में बहुत चर्चा हुआ करती थी।


एेसे हुआ नामकरण

 रामकृष्ण अपना अधूरा कार्यभार नरेंद्रनाथ को सौंपने वाले थे। एक दिन रामकृष्ण ने एक कागज के टुकड़े पर लिखा- `नरेंद्र लोक शिक्षण का कार्य करेगा। कुछ मुंह बनाकर नरेंद्रनाथ बोले- यह सब मुझसे नहीं होगा। रामकृष्ण तुरंत दृढता से बोले- क्या, नहीं होगा। अरे तेरी अस्थियां ये काम करेंगी। आगे रामकृष्ण नेने नरेंद्रनाथ को संन्यास दीक्षा देकर उनका नामकरण ‘स्वामी विवेकानंद’ किया। रामकृष्ण परमहंस के महासमाधि लेने के उपरांत स्वामी विवेकानंद ने अपने एक गुरुबंधु तारकनाथ की सहायता से कोलकाता के निकट वराहनगर भाग के एक खंडहर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। इससे पूर्व उस स्थान पर भूतों का डेरा है, ऐसी लोगों की भ्रांति थी। विवेकानंद ने श्रीरामकृष्ण की उपयोग में लाई गई वस्तुएं तथा उनके भस्म एवं अस्थियों का कलश वहां रखा और उनके भक्त वहां रहने लगे।

 

शिकागो जाने के विषय में पूर्वसूचना

एक दिन रात्रि में अर्धजागृत अवस्था में स्वामी विवेकानंद जी को एक अद्भुत स्वप्न दिखाई दिया। रामकृष्ण ज्योतिर्मय देह धारण कर समुद्र से आगे-आगे बढ़ते जा रहे हैं तथा स्वामी विवेकानंद को अपने पीछे-पीछे आने के लिए संकेत दे रहे हैं। क्षणभर में स्वामीजी की आंख खुल गयी। उनका हृदय अवर्णनीय आनंद से भर उठा। उसके साथ ही `जा’, ऐसी यह देववाणी सुस्पष्ट रूप से सुनाई दी। परदेश में प्रस्थान करने का संकल्प दृढ हो गया। एक-दो दिन में ही प्रवास यात्रा की सर्व तैयारी पूरी कर ली गयी।



शिकागो की धर्मसभा परिषद के लिए प्रस्थान

31 मई 1893 को `पेनिनशुलर’ जलयान ने मुंबई का समुद्रतट छोड़ा। 15 जुलाई को कनाडा के बैंकुवर बंदरगाह पर स्वामी जी पहुंचे। वहां से रेलगाड़ी से अमेरिका के प्रख्यात महानगर शिकागो आए। धर्मसभा परिषद 11 सितंबर को आयोजित हो रही है, ऐसा उन्हें ज्ञात हुआ था। धर्मसभा परिषद में सहभाग लेने के लिए आवश्यक परिचय पत्र उनके पास नहीं था। प्रतिनिधि के रूप में नाम प्रविष्ट कराने की कालावधि भी समाप्त हो चुकी थी।