तुलसी पूजा व‍िशेष: 'तुलसी' पौधा नहीं 'संजीवनी'
Post By : CN Rashtriya Webdesk   |  Posted On: 4 months ago  |  527

तुलसी पूजा व‍िशेष: 'तुलसी' पौधा नहीं 'संजीवनी'

 तुलसी माता से जुड़ी एक बहुत प्रचलित कथा है। श्रीमद देवी भागवत पुराण में इनके अवतरण की दिव्य लीला कथा भी बनाई गई है। एक बार शिव ने अपने तेज को समुद्र में फैंक दिया था। उससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म लिया। यह बालक आगे चलकर जालंधर के नाम से पराक्रमी दैत्य राजा बना। इसकी राजधानी का नाम जालंधर नगरी था। दैत्यराज कालनेमी की कन्या वृंदा का विवाह जालंधर से हुआ। जालंधर महाराक्षस था। अपनी सत्ता के मद में चूर उसने माता लक्ष्मी को पाने की कामना से युद्ध किया, परंतु समुद्र से ही उत्पन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपने भाई के रूप में स्वीकार किया।

वहां से पराजित होकर वह देवी पार्वती को पाने की लालसा से कैलाश पर्वत पर गया। भगवान देवाधिदेव शिव का ही रूप धर कर माता पार्वती के समीप गया, परंतु मां ने अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया तथा वहां से अंतर्ध्यान हो गईं। देवी पार्वती ने क्रुद्ध होकर सारा वृतांत भगवान विष्णु को सुनाया। जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। इसीलिए जालंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत ज़रूरी था।

 

इसी कारण भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण कर वन में जा पहुंचे, जहां वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थीं। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे, जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गईं। ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जालंधर के बारे में पूछा।

ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट किए। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह दशा देखकर वृंदा मूर्छित हो कर गिर पड़ीं। होश में आने पर उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से विनती की कि वह उसके पति को जीवित करें।

 

भगवान ने अपनी माया से पुन: जालंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया, परंतु स्वयं भी वह उसी शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को इस छल का ज़रा आभास न हुआ। जालंधर बने भगवान के साथ वृंदा पतिव्रता का व्यवहार करने लगी, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया। ऐसा होते ही वृंदा का पति जालंधर युद्ध में हार गया।इस सारी लीला का जब वृंदा को पता चला, तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु को शिला होने का श्राप दे दिया तथा स्वयं सती हो गईं। जहां वृंदा भस्म हुईं, वहां तुलसी का पौधा उगा। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा, ‘हे वृंदा। तुम अपने सतीत्व के कारण मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। जो मनुष्य भी मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुलसी का विवाह करेगा उसे इस लोक और परलोक में विपुल यश प्राप्त होगा।’

 

जिस घर में तुलसी होती हैं, वहां यम के दूत भी असमय नहीं जा सकते। गंगा व नर्मदा के जल में स्नान तथा तुलसी का पूजन बराबर माना जाता है। चाहे मनुष्य कितना भी पापी क्यों न हो, मृत्यु के समय जिसके प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल मुख में रखकर निकल जाते हैं, वह पापों से मुक्त होकर वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है। जो मनुष्य तुलसी व आंवलों की छाया में अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उसके पितर मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं।उसी दैत्य जालंधर की यह भूमि जलंधर नाम से विख्यात है। सती वृंदा का मंदिर मोहल्ला कोट किशनचंद में स्थित है। कहते हैं इस स्थान पर एक प्राचीन गुफ़ा थी, जो सीधी हरिद्वार तक जाती थी।

 

 तुलसी के पौधे का महत्व धर्मशास्त्रों में भी बखूबी बताया गया है। तुलसी के पौधे को माता लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। सनातन धर्म में तुलसी के पौधे से कई आध्यात्मिक बातें जुड़ी हैं। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु को तुसली अत्यधिक प्रिय है। तुलसी के पत्तों के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। क्योंकि भगवान विष्णु का प्रसाद बिना तुलसी दल के पूर्ण नहीं होता है। तुलसी की प्रतिदिन का पूजा करना और पौधे में जल अर्पित करना हमारी प्राचीन परंपरा है। मान्यता है कि जिस घर में प्रतिदिन तुलसी की पूजा होती है, वहां सुख-समृद्धि, सौभाग्य बना रहता है कभी कोई कमी महसूस नहीं होती। जिस घर में तुलसी का पौधा होता है उस घर की कलह और अशांति दूर हो जाती है। घर-परिवार पर मां की विशेष कृपा बनी रहती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी के पत्तों के सेवन से भी देवी-देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन तुलसी का सेवन करता है, उसका शरीर अनेक चंद्रायण व्रतों के फल के समान पवित्रता प्राप्त कर लेता है।

 

 

तुलसी के पत्ते पानी में डालकर स्नान करना तीर्थों में स्नान कर पवित्र होने जैसा है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति ऐसा करता है वह सभी यज्ञों में बैठने का अधिकारी होता है। कार्तिक महीने में तुलसी जी और शालीग्राम का विवाह किया जाता है। कार्तिक माह में तुलसी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि तुलसी पूजन और उसके पत्तों को तोड़ने के लिए नियमों का पालन करना अति आवश्यक है।



तुलसी पूजन के नियम

तुलसी का पौधा हमेशा घर के आंगन में लगाना चाहिए आज के दौर में जगह का अभाव होने की वजह तुलसी का पौधा बालकनी में लगा सकते है। रोज सुबह स्वच्छ होकर तुलसी के पौधे में जल दें और एवं उसकी परिक्रमा करें। सांय काल में तुलसी के पौधे के नीचे घी का दीपक जलाएं, शुभ होता है

भगवान गणेश, मां दुर्गा और भगवान शिव को तुलसी न चढ़ाएं। आप कभी भी तुलसी का पौधा लगा सकते हैं लेकिन कार्तिक माह में तुलसी लगाना सबसे उत्तम होता है। तुलसी ऐसी जगह पर लगाएं जहां पूरी तरह से स्वच्छता हो। तुलसी के पौधे को कांटेदार पौधों के साथ न रखें।


तुलसी की पत्तियां तोड़ने के भी कुछ विशेष नियम हैं

तुलसी की पत्तियों को सदैव सुबह के समय तोड़ना चाहिए। अगर आपको तुलसी का उपयोग करना है तो सुबह के समय ही पत्ते तोड़ कर रख लें, क्योंकि तुलसी के पत्ते कभी बासी नहीं होते हैं। बिना जरुरत के तुलसी की पत्तियां नहीं तोड़नी चाहिए, यह उसका अपमान होता है। तुलसी की पत्तियां तोड़ते समय स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें। तुलसी के पौधे को कभी गंदे हाथों से न छूएं। तुलसी की पत्तियां तोड़ने से पहले उसे प्रणाम करना चाहिए और इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिएा महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी, आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते। बिना जरुरत के तुलसी की पत्तियां नहीं तोड़नी चाहिए, यह उसका अपमान होता है।रविवार, चंद्रग्रहण और एकादशी के दिन तुलसी नहीं तोड़ना चाहिए। तुलसी के पत्ते, जड़़, तना, मंजीरी, लकड़ी सभी दवाई बनाने व पूजा में उपयोग आते हैा   

"तुलसी वृक्ष ना जानिये।

गाय ना जानिये ढोर।।

गुरू मनुज ना जानिये।

ये तीनों नन्दकिशोर।।

अर्थात-

तुलसी को कभी पेड़ ना समझें

गाय को पशु समझने की गलती ना करें और गुरू को कोई साधारण मनुष्य समझने की भूल ना करें, क्योंकि ये तीनों ही साक्षात भगवान रूप हैं।



   ये न करें

1. तुलसी जी को नाखूनों से कभी नहीं तोडना चाहिए,

2.सांयकाल के बाद तुलसी जी को स्पर्श भी नहीं करना चाहिए ।

3. रविवार को तुलसी पत्र नहीं

तोड़ने चाहिए ।

4. जो स्त्री तुलसी जी की पूजा करती है। उनका सौभाग्य अखण्ड रहता है । उनके घर

सुख शांति व समृद्धि का वास रहता है घर का आबोहवा हमेशा ठीक रहता है।

5. द्वादशी के दिन तुलसी को नहीं तोडना चाहिए ।

6. सांयकाल के बाद तुलसी जी लीला करने जाती है।

7. तुलसी जी वृक्ष नहीं है! साक्षात् राधा जी का स्वरूप  है ।

8. तुलसी के पत्तो को कभी  चबाना नहीं चाहिए।


श्वास

ब्रोन्काइटिस जैसी घातक बिमारियों से लड़ने वाली तुलसी श्वास सम्बन्धी समस्याओं का निदान करती है। ये बैक्टीरिया, वायरस और फंगस के संक्रमण से लड़ने के साथ ही लोगों में श्वास लेने में होने वाली परेशानियों का भी निवारण करती है।

श्वास समबन्धि रोगों से लड़ने की क्षमता इसमें मौजूद तत्वों के कारण आती है। ये तत्व कैफे, यूजीन, और सिनेोल जैसे तेल होते हैं।

अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, खांसी, जुखाम, इन्फ्लुएंजा जैसी बिमारियों में तुलसी की पत्तियों को शहद और अदरक के साथ उबालकर लेना फायदेमंद होता है।

तुलसी की पत्तियों को लौंग और नमक के साथ पानी में उबालकर लेने से इन्फ्लुएंजा का इलाज किया जा सकता है। इन मिश्रणों को पानी के 2 क्वार्टस में तब तक उबालना चाहिए जब तक पानी आधा न रह जाए।

 

फेफड़ों में

तुलसी धूम्रपान, तपेदिक के कारण फेफड़ों में हुए नुकसानों को ठीक करने और फेफड़ों के कैंसर से बचने में प्रभावी पाए जाते हैं। तुलसी में मौजूद विटामिन सी कैफेने, इयूजेनॉल और सिनीओल फेफेदों की समस्या का समादान करते हैं।

अपनी एंटीबायोटिक गुणों के कारण इसमें ट्यूबरक्लोसिस से लड़ने की क्षमता भी रखता है।

तनाव

ब्लड प्रेशर नियंत्रित करकेसूजन को घटाकर, और नर्व सेल्स को संयमित रखकर तुलसी तनाव को कम करने का काम भी करती है। विटामिन सी और एंटीओक्सीडैन्ट्स की मौजूदगी के कारण तुलसी में इंसान को तनाव मुक्त करने की क्षमता होती है।तुलसी में पोटेशियम, सोडियम की जगह लेता है और तनावग्रस्त रक्त कोशिकाओं को खोलकर रक्तचाप से संबंधित तनाव को कम करने का काम करता है।  

तुलसी की पत्तियों को तनाव से मुक्ति पाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। प्रतिदिन दो बार 12 तुलसी की पत्तियों को चबाने से तनाव की समस्या का समाधान होता है। ये रक्त को शुद्ध करता है और अन्य रोगों से भी छुटकारा दिलाता है।

 

माउथ फ्रेशनर

तुलसी को हम एक आयुर्वेदिक माउथ फ्रेशनर की तरह भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे दांतों की सफाई होती है और मुख की श्वास से आने वाली दुर्गन्ध से भी निजात मिलती है।

दांत रोग

तुलसी उस बैक्टीरिया को नष्ट करने की काबिलियत रखती है जो दांतों में सडन से लिए ज़िम्मेदार होता है। इसमें ऐसे गुण होते हैं जो दांतों को मजबूत बनाते हैं और उन्हें टूटने से बचाते हैं। 

तुलसी में मरकरी जैसे कुछ रोग निरोधक तत्व भी होते हैं जिनमें समृद्ध रोगाणुनाशक गुण होते हैं जो दांतों के लिए हानिकारक हो सकते हैं यदि उन्हें लंबे समय तक सीधे संपर्क में रखा जाता है। इसलिए, इन पत्तों को चबाने से बचने की सलाह दी जाती है।

हालांकि, यदि आप इसे चबाएं न और ऐसे ही निगल जायें तो इसकी कोई हानि नहीं होगी। 

तुलसी की पत्तियों को धूप में सुखाकर इसका चूर्ण बना लें और इसे दांतों को साफ़ करने के लिए इस्तेमाल करें।

आप इसे हर्बल बनाने के लिए इसे सरसों के तेल में मिला सकते हैं। ये आपको श्वास की बदबू और दांतों की अन्य समस्याओं से निजात दिलाता है।

 पथरी

तुलसी एक डिटॉक्सीफिर का काम करती है और शरीर में मौजूद यूरिक एसिड को हटाती है जो किडनी में पथरी का मुख्य कारण माना जाता है। यह पेशाब की वृद्धि के माध्यम से गुर्दे को साफ करने में भी मदद करता है।

तुलसी में मौजूद एसिटिक एसिड पथरी को घुलाने में मददगार होती है। इसमें दर्द को झेलने की क्षमता होती है जो पथरी के कारण होने वाली पीड़ा को सहने में सहायक बनती है।

तुलसी किडनी के लिए अत्यधिक लाभदायक होती है। यदि आपकी किडनी में पथरी है तो तुलसी का रस शहद के साथ 6 महीने तक लेने से आपको पथरी की समस्या से राहत मिलेगी। 

सिरदर्द

तुलसी सरदर्द में अत्यधिक उपयोगी होता है। तुलसी की पत्तियों को आधा कुअर्ट पानी में उबालें जब तक कि पानी की मात्रा आधी न रह जाए। प्रति घंटे 2 चम्मच इसे लेने से आपको सूजन और तकलीफ से निजात मिलता है। आप चन्दन के साथ मिलकर इसका पेस्ट भी बना सकते हैं जिससे आपको आराम मिलेगा।

 सरदर्द लोगों के लिए एक जटिल समस्या बना गया है। तनाव, खान पान आदि भिन्न भिन्न आदतों के कारण लोग सरदर्द से ग्रस्त रहने लगे हैं। सरदर्द भागने के उपायों में तुलसी भी शामिल है।

माइग्रेन, साइनस के दबाव, खांसी, और ठंड या उच्च रक्तचाप के कारण हुए सरदर्द को तुलसी के सेवन से ठीक किया जा सकता है। तुलसी में पाए जाने वाले कैंबेने, यूगेनॉल, सिनेोल, कैवॅकोरोल, और मिथाइल-चाविकॉल में सरदर्द से होने समस्याओं का निवारण करने की क्षमता होती है क्योंकि इनमें एनलजेसिक, सेडेटिव, एंटी-कांजेस्तिव और डिसइनफेकटेंट गुण होते हैं।

दिल की बीमारी

हृदय रोग आजकल एक बहुत ही आम समस्या बन गया है और इसके कारण काफी लोगों की मृत्यु भी हो जाती है। तुलसी एक ऐसी औषधि है जो इससे लड़ने में सहायता करता है।

तुलसी में विटामिन सी और कई एंटीओक्सीडैन्ट्स जैसे कि यूजेनॉल मौजूद होते हैं जो दिल की बिमारियों से लड़ने में सहायक होते हैं। यूजेनॉल रक्त में मौजूद कोलेस्ट्रोल के स्तर को घटाता है और हृदय सम्बन्धी रोगों को दूर रखता है।

रोग प्रतिरोधक क्षमता

तुलसी के अन्दर प्रतिरक्षा प्रणाली(इम्यून सिस्टम) को मज़बूत कर देता है और शरीर को बिमारियों से लड़ने के सक्षम बनता है। 

यह वायरस, बैक्टीरिया, फंगस और प्रोटोजोआ से होने वाले लगभग सभी संक्रमणों से बचाता है। हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि यह एचआईवी और कैसरजनिक कोशिकाओं के विकास को बाधित करने में भी उपयोगी है।

आंख

आँखों की परेशानियों को दूर करने के लिए पानी में तुलसी की पत्तियां डालकर धोएं। इससे आँखों में कंजंक्टिवाइटिस आदि की समस्या दूर होती है। ये समस्याएं बैक्टीरियल या फंगल संक्रमण के कारण होती हैं।

यह आंखों की सूजन को भी कम करती है और तनाव को कम करता है। इसको नियमित रूप से खाने से मोतियाबिंद, मैक्यूलर डिएनेरेशन, ग्लूकोमा, दृष्टि दोष, और नेत्र, से हुई क्षति से आपकी आंखों की रक्षा होती है।

जिन लोगों को रात में देखने में परेशानी होती है और आँखों से सम्बंधित अन्य समस्याएं होती हैं उन्हें तुलसी का सेवन करने से आराम मिलता है। रात को सोते समय 2 बूँद काली तुलसी का रस आँखों में डालने से आपको आराम मिलेगा।

 

त्वचा

रोज़ सुबह पानी में तुलसी डालकर स्नान करने से त्वचा स्वस्थ रहती है और किसी भी प्रकार के संक्रमण से त्वचा की रक्षा होती है। इसे लोग अपने चहरे पर भी इस्तेमाल करते हैं जिससे चहरे की चमक वापिस आ जाती है। सिर्फ तुलसी का उपयोग करके ही हम अपनी त्वचा को हर प्रकार के संक्रमण से मुक्त रख सकते हैं।

शरीर पर तुलसी के पत्तों का रस लगाने से मच्छर और अन्य कीड़े नहीं काटे हैं। यह आन्तरिक रूप से और बाहरी रूप से त्वचा के विकारों को पूरी तरह मिटा देता है। ऐसा कभी नहीं पाया गया है कि तुलसी को इस्तेमाल करने से इसके कोई दुष्प्रभाव हुए हों। इसके एंटीफंगल, एंटीबैक्टीरियल और एंटीबायोटिक गुणों के कारण ये संभव हो पाता है। इसको त्वचा पर लगाने से अतिरिक्त तेल भी निकल जाता है।

तुलसी का रस दाद जैसी समस्याओ में इस्तेमाल करने से आपको आराम मिलता है। कई लोगों ने लयूकोडरमिया के उपचार में लाभदायक पाया है।

 

 

बुखार

तुलसी में पाए जाने वाले पोषक तत्व बुखार के कारणों को दूर कर, बुखार से निजात दिलाते हैं। भारत में यह पुरानी प्रथा है कि यदि किसी व्यक्ति को बुखार ने घेर रखा है तो उसको तुलसी की पत्तियों का काढ़ा बनाकर दिया जाता है।

तुलसी विभिन्न प्रकार के बुखार के उपचार के लिए अत्यधिक लाभदायक मानी जाती है। इससे मलेरिया जैसे घातक और संक्रामक बुखार आसानी से ठीक हो जाते हैं। 

नीम की पत्तियों को दालचीनी के साथ उबालकर दूध और शक्कर के साथ मिलाने से शरीर का तापमान गिराया जा सकता है। हर 2-3 घंटो में इसे मरीज़ को देने से उसका उपचार किया जा सकता है। ये तरीका बच्चों के इलाज के लिए सबसे अधिक उपयोगी होता है।

खांसी

अनेक प्रकार के खांसी के सिरप का मुख्य घटक होता है। अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारी के मरीजों के लिए तुलसी चमत्कारी साबित होती है। तुलसी को चबाने से खांसी जुखाम के लक्षणों से मुक्ति मिल जाती है।

गले में खराश

पानी में तुलसी की पत्तियां उबालकर गार्गल करने से गले की खराश और गले खराब करने वाले संक्रमण से निजात पाना आसान होता है।

हृदय रोग

कमज़ोर हृदय वालों के लिए तुलसी बहुत ही लाभदायक होती है। इससे आपके शरीर के कोलेस्ट्रोल के स्तर में भी गिरावट आती है।

बच्चों की बीमारियाँ

बच्चों की बीमारियाँ जैसे की खांसी, जुखाम, बुखार, डायरिया, उलटी, आदि तुलसी की पत्तियों के रस के सेवन से ठीक की जा सकती हैं।

इसके अतिरिक्त ये चिकन पॉक्स जैसी बिमारियों में भी उपयोगी होता है यदि इसे केसर के साथ लिया जाए।

मुँह का संक्रमण

दिन में दो बार तुलसी की पत्तियां चबाने से मुँह में किसी भी प्रकार का संक्रमण नहीं रहता है और छाले यदि हों तो ठीक हो जाते हैं।

कीड़ों का काटना

तुलसी रोगनिरोधक और रोगनिवारक, दोनों के समान इस्तेमाल किया जा सकता है। 1 चम्मच तुलसी का रस हर घंटे लेने से कीड़े के काटे हुए में राहत मिलती है।

इसके अतिरक्त, तुलसी के रस को काटे हुए स्थान पर लगाने से खुजली और सूजन में आराम मिलता है। आप कीड़े या लीछ के काटे हुए में तुलसी का पेस्ट लगाना उपयोगी होता है।

 

चिकित्सीय गुण

तुलसी का प्रयोग आपकी याददाश्त तेज़ करता है, नर्व टॉनिक की तरह उपयोगी होता है और आपके गले से कफ हटाने में सहायक होता है। ये पत्तियां पेट को मज़बूत करती है और परिष्कृत पसीना बहाती हैं।इसका इस्तेमाल म्यूकस निकालने के लिए किया जा सकता है। इसका सेवन हर घंटे किया जा सकता है।

 

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