आज से शुरू हुआ पितृपक्ष, जानें श्राद्ध व तर्पण की विधी, महत्व आैर समस्त जानकारी
Post By : CN Rashtriya Webdesk   |  Posted On: a month ago  |  227

आज से शुरू हुआ पितृपक्ष, जानें श्राद्ध व तर्पण की विधी, महत्व आैर समस्त जानकारी

पूर्वजों की आत्माओं की संतुष्टि के लिए श्रद्धा भाव से विधि-विधान के साथ किये गये यज्ञ को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध की व्यवस्था वैदिक काल से चली आ रही है। शास्त्रों में इसे श्राद्ध यज्ञ कहा गया है। श्राद्ध का उद्देश्य अपने पितरों के प्रति सम्मान करना है क्योंकि यह मनुष्य योनि अर्थात् हमारा शरीर पितरों की आत्माओं की कृपा के कारण हमें मिला है। ऐसे में पूर्वजों के ऋणों से मुक्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध की मूलभूत परिभाषा यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाय वह श्राद्ध है।

श्राद्ध के प्रकार

मत्सय पुराण के अनुसार श्राद्ध के तीन प्रकार बताए गये हैं- नित्य, नैमित्तिक और काम्य। इनमें से नित्य श्राद्ध वे हैं जो अघ्र्य तथा आवाहन के बिना ही किसी निश्चित अवसर पर किये जाते हैं। जैसे अमावस्या के दिन या फिर अष्टका के दिन का श्राद्ध। देवताओं के लिए किया जाने वाला श्राद्ध नैमित्तिक श्राद्ध कहलाता है। यह श्राद्ध किसी ऐसे अवसर पर किया जाता है जो अनिश्चित होता है। जैसे कि यह श्राद्ध पुत्र जन्म आदि के समय किया जाता है. किसी विशेष फल के लिए जो श्राद्ध किये जाते हैं वे काम्य श्राद्ध कहलाते हैं. लोग इसे स्वर्ग, मोक्ष, संतति आदि की कामना से प्रत्येक वर्ष करते हैं।

श्राद्ध का धार्मिक महत्व

मनुष्य शरीर में स्थित आत्माओं का परस्पर शाश्वत संबंध है। इसका कारण यह है कि आत्मा परमात्मा का अंश है और आत्मा स्वरूपी भौतिक शरीरधारी मनुष्य अपने पूर्वजों आदि की आत्माओं की संतुष्टि के लिए पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में पितरों के नाम और गोत्र का उच्चारण करके मंत्रों द्वारा जो अन्न उनके लिए अर्पित किया जाता है, वह उन्हें प्राप्त हो जाता है। यदि आपके पितरों को उनके कर्म के अनुसार देव योनि प्राप्त हुई है तो वह उन्हें अमृत रूप में प्राप्त होता है। यदि उन्हें गंधर्वलोक प्राप्त हुआ है तो उन्हें भोग्य रूप में और यदि उन्हें पशु योनि प्राप्त हुई है तो उन्हें तृण रूप में और यदि सर्प योनि प्राप्त हुई है तो वायु रूप में और यदि दानव योनि प्राप्ति हुई है तो मांस रूप में और यदि प्रेत योनि प्राप्ति हुई है तो रुधिर रूप में और यदि मनुष्य योनि प्राप्ति हुई है तो उन्हें अन्न रूप में प्राप्त होता है।

06 अक्टूबर तक रहेगा पितृपक्ष 

भाद्रपद महीने की पूर्णिमा से शुरू  होकर पितृमोक्षम अमावस्‍या 15 दिन तक का पितृ पक्ष होता है। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष बहुत अहम है। इन 15 दिनों में लोग अपने पूर्वजों  को याद करते हैं और उनकी आत्‍मा की शांति के लिए श्राद्ध करते हैं। 06 अक्टूबर तक पितृपक्ष रहेगा। देश की प्रमुख जगहों जैसे हरिद्वार, गया आदि जाकर पिंडदान करते हैं। कुंडली के पितृ दोष दूर करने के लिए पितृपक्ष का समय सबसे अच्छा माना जाता है। इन दिनों पितरों को खुश करने के लिए और उनका आर्शीवाद पाने के लिए कई तरह के उपाय किए जाते हैं।

पितृ दोष होने पर क्या होता है

जिन लोगों की कुंडली में पितृ दोष होता है उन लोगों को संतान सुख आसानी से नहीं मिलता है। या फिर संतान बुरी संगत में पड़ जाता है। इन लोगों को नौकरी या व्यापार में हमेशा दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। काम में बार-बार बाधा आती है। घर में ज्यादा क्लेश-झगड़े होते हैं। घर में सुख-समृद्धि नहीं आती है। गरीबी और कर्ज बना रहता है। अक्सर बीमार रहते हैं और बेटी या बेटे की शादी में रुकावट आती है।

प्रसन्न करने के उपाय 

पितरों को प्रसन्न करके पितृ दोष को आसानी से दूर किया जा सकता है। श्राद्ध के पहले दिन भाद्रपद पूर्णिमा का का व्रत करें। घर या व्यापार स्थल पर स्वर्गीय पितरों की अच्छी तस्वीरें लगाएं। ये तस्वीर दक्षिण-पश्चिम दीवार या कोने पर लगाएं। दिन शुरू  करने के बाद सबसे पहले उनको प्रणाम करें। हर दिन उन्हें माला चढ़ाएं और धूपबत्ती दिखाकर उनका आशीर्वाद लें। उनके नाम पर जरूरतमंदों को खाना बांटें। पितरों  के नाम से धार्मिक स्थल पर धन या सामग्री दान करें। घर या बाहर के बड़े बुजुर्गों  की सेवा कर उनका आशीर्वाद लें। अमावस्या पर तर्पण, पिंड दान कर ब्राह्मणों को भोजन कराएं। गाय, कुत्ते, चीटियों, कौवों या अन्य पशु पक्षियों को खाना खिलाएं।

नहीं करते शुभ काम 

पितृ पक्ष में कोई भी शुभ काम जैसे शादी, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश, घर के लिए महत्‍वपूर्ण चीजों की खरीददारी नहीं की जाती है। यहां तक कि लोग नए कपड़े भी इस दौरान नहीं खरीदते हैं और ना ही कोई नया काम शुरू  करते हैं। साथ ही इस दौरान बेहद सादा जीवन जीने और सात्विक भोजन करने के लिए भी कहा गया है। 

श्राद्घ का वास्तविक अर्थ 

श्राद्ध की मूलभूत परिभाषा यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाय वही श्राद्ध है। मृत्यु के बाद बिना पिंड दान के मृत व्यक्ति प्रेत संज्ञा यानि जो सूक्ष्म शरीर जो देहांत के बाद धारण किया जाए, में रहता है। पिण्डदान के बाद वह पितरों में सम्मिलित हो जाता है। पितृपक्ष में पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उससे  वह अपने पूर्वजों का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से पितृपक्ष प्रारंभ होता है आैर 15 दिन शुक्ल प्रतिपदा तक चलता है। 

पितृ पक्ष का महत्व

28 अंश रेतस् को पितृऋण कहते हैं। 28 अंश रेतस् के रूप में श्रद्धा नामक मार्ग से भेजे जाने वाले पिण्ड तथा जल आदि के दान को ही श्राद्ध कहते है। इस श्राद्ध नामक मार्ग का सम्बन्ध मध्यान्हकाल में पृथ्वी से होता है। इसीलिए मध्यान्हकाल में श्राद्ध करने का विधान है। पृथ्वी पर कोई भी वस्तु सूर्यमण्डल तथा चन्द्रमण्डल के सम्पर्क से ही बनती है। संसार में सोम सम्बन्धी वस्तु विशेषतः चावल और यव हैं। धर्मशास्त्र का निर्देश है कि माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है। उन्हें गन्धर्वलोक प्राप्त होने पर भोग्यरूप में, पशुयोनि में तृणरूप में, सर्पयोनि में वायु रूप में, यक्षयोनि में पेयरूप में, दानवयोनि में मांसरूप में, प्रेतयोनि में रूधिररूप में, और मनुष्यरूप में अन्न आदि के रूप में उपलब्ध होता है। जब पितर यह सुनते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित हो गया है तो वह एक दूसरे का स्मरण करते हुए मनोमय रूप से श्राद्धस्थल पर उपस्थित हो जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं। यह भी कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं तो पितर अपने पुत्रों पौत्रों के यहां आते हैं। विशेषतः आश्विन अमावस्या के दिन वह दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। यदि उस दिन उनका श्राद्ध नहीं किया जाता तो वह शाप देकर लौट जाते हैं। अतः उस दिन पत्र-पुष्प, फल और जल तर्पण से यथाशक्ति उनको तृप्त करना चाहिए। श्राद्ध से विमुख नहीं होना चाहिए। 

श्राद्घ के स्वरूप 

मुख्यतः श्राद्ध दो प्रकार के है। पहला एकोद्दिष्ट और दूसरा पार्वण, लेकिन बाद में चार श्राद्धों को मुख्यता दी गई। इनमें पार्वण, एकोद्दिष्ट, वृद्धि और सपिण्डीकरण आते हैं। आजकल यही चार श्राद्ध समाज में प्रचलित हैं। वृद्धि श्राद्ध का मतलब नान्दीमुख श्राद्ध है। श्राद्धों की पूरी संख्या बारह है- नित्यं नैमित्तिकं काम्य वृद्धिश्राद्ध सपिंडनम्। पार्वण चेति विज्ञेयं गोष्ठ्यां शुद्धयर्थष्टमम्।। कर्मागं नवमं प्रोक्तं दैविकं दशमं स्मृतमृ। यात्रा स्वेकादर्श प्रोक्तं पुष्टयर्थ द्वादशं स्मृतम्।। इनमें नित्यश्राद्ध, तर्पण और पंचमहायज्ञ आदि के रूप में, प्रतिदिन किया जाता है। नैमित्तिक श्राद्ध का ही नाम एकोद्दिष्ट है। यह किसी एक व्यक्ति के लिए किया जाता है। मृत्यु के बाद यही श्राद्ध होता है। प्रतिवर्ष मृत्युतिथि पर भी एकोद्दिष्ट ही किया जाता है। काम्य श्राद्ध, अभिप्रेतार्थ सिद्धर्य्थ अर्थात् किसी कामना की पूर्ति की इच्छा के लिए किया जाता है। वृद्धिश्राद्ध पुत्र जन्म आदि के अवसर पर किया जाता है। इसी का नाम नान्दी श्राद्ध है। सपिण्डनश्राद्ध मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडषी के बाद किया जाता है। इसके बाद मृत व्यक्ति को पितरों के साथ मिलाया जाता है। प्रेतश्राद्ध में जो पिण्डदान किया जाता है, उस पिण्ड को पितरों को दिये पिण्ड में मिला दिया जाता है। पार्वण श्राद्ध प्रतिवर्ष आश्विन कृष्णपक्ष में मृत्यु तिथि और अमावस्या के दिन किया जाता है।



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