बांग्ला साहित्य के ज़रिये भारतीय सांस्कृति को विश्व भर में प्रसिद्ध किये थे गुरुदेव
Post By : CN Rashtriya Webdesk   |  Posted On: 6 months ago  |  424

बांग्ला साहित्य के ज़रिये भारतीय सांस्कृति को विश्व भर में प्रसिद्ध किये थे गुरुदेव

आज देश गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 160वीं जयंती मना रहा है। गुरुदेव का जन्म 7 मई 1861 में कोलकाता के जोड़ा-साँको में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेन्द्रनाथ टैगोर और मां का नाम शारदा देवी था। उन्होंने सेंट जेवियर स्कूल में स्कूल अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए सन 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में एक पब्लिक स्कूल में दाख़िला लिया। उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई तो की लेकिन 1880 में बिना डिग्री लिए भारत लौट आए। लेकिन इनका परिचय इतना ही नहीं है। गुरुदेव बहुआयामी प्रतिभा वाली शख़्सियत थे। एक महान कवि होने के साथ ही, वो एक मानवतावादी, देशभक्त, चित्रकार, उपन्यासकार, कहानीकार, शिक्षाविद् और दर्शनशास्त्री भी थे। विश्वविख्यात महाकाव्य गीतांजली की रचना के लिये उन्हें 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साहित्य के क्षेत्र में नोबेल जीतने वाले वे अकेले भारतीय हैं। भारत को पहला नोबल इनकी रचना गीतांजली को ही मिला था। 

गुरुदेव ने बांग्ला साहित्य के ज़रिये भारतीय सांस्कृति को विश्व भर में प्रसिद्ध किया। वे एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनकी दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्रगान जन-गण-मन और बांग्लादेश का राष्ट्रगान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएं हैं। उनकी रचनाओं में गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, शिशु भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कई किताबों का अनुवाद अंग्रेज़ी में किए। अंग्रेज़ी अनुवाद के बाद उनकी रचनाएं पूरी दुनिया में फैली और मशहूर हुईं। 

आज भी जब हम उनकी लिखी राष्ट्र गान 'जन मन गण' गाते हैं तो देशभक्ति की ज्वाला हमारे अंदर फूट पड़ती है। रबीन्द्र नाथ टौगोर की सारी रचनाएं केवल मानवता, प्रेम और भाईचारे का ही पैगाम देती है। आज के वक्त में या यूं कहें आज के माहौल में इनको पढ़ना और समझना बहुत ही ज्यादा जरुरी हो गया है। इनकी कुछ महत्वपूर्ण रचनाएँ गीतांजलि, आमार सोनार बांग्ला, घेर-बेर, रबीन्द्र संगीत आज भी बंगाली और बंगाली सभ्यता पर चार चंद लगाते । 

सन 1901 में गुरुदेव ने सियालदह को छोड़कर शांतिनिकेतन आ गए। उन्होंने प्रकृति की गोद में एक लाइब्रेरी के साथ टैगोर ने शांतिनिकेतन की स्थापना की। टैगोर ने यहां विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। शांतिनिकेतन में टैगोर ने अपनी कई साहित्यिक कृतियां लिखीं थीं और यहां मौजूद उनका घर ऐतिहासिक महत्व का है। रविंद्रनाथ टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की। उनकी ज़्यादातर रचनाएं गीतों में बदल चुकी हैं। 7 अगस्त 1941 को उन्होंने कोलकाता में अंतिम सांस ली। 

आज भी उनकी रचनाएँ, गाने लोगों के जहन में बसी हुई है। बंगाल के लोगों का रविंद्रनाथ टैगोर के साथ भावनाएं जुड़ी हुई है। आज भी उनके गाने की लोकप्रियता कम नहीं हुई है।  बंगाल में ज्यादातर अनुष्ठान में रविंद्रनाथ टैगोर के गाने बजाए जाते है। 

आज गुरुदेव के जन्म दिवस के मौके पर सभी ने इस विभूति को नमन किया। आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सभी लोगों ने इनको श्रद्धांजली अर्पित की है। प्रधानमंत्री मोदी ने बांग्ला भाषा में ट्वीट कर गुरुदेव के प्रति अपने आस्था को व्यक्त किया। इसके अलावा बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जोड़ासांकू में जाकर उनको नमन किया।  कोलकाता नगर निगम के प्रवेक्षक फिरहाद हाकिम भी ठाकुर बाड़ी जाकर उनके समक्ष शीश झुकाया।

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